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सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

आरटीआई लागू करने के लिए जिस जिले से शुरू हुआ संघर्ष, वहीं पर सरकारी दफ्तरों से बोर्ड तक हट गए

(पंकज यादव). सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 15 साल पहले लागू किए गए सूचना का अधिकार कानून काे सरकारी नुमाइंदे कमजाेर करने में लगे हैं। जिले के 90 प्रतिशत दफ्तरों में आमजन को इस कानून से जुड़ी जानकारी देने वाले बोर्ड हटा दिए गए हैं। जबकि अजमेर ही वह जगह है जहां से 1996 में आरटीआई कानून को लेकर जन आंदोलन शुरू हुआ था।

लोक सूचना अधिकारी के स्तर पर जो सूचनाएं मिल जानी चाहिए, उसके लिए राज्य आयोग में अपीलें पेश करनी पड़ रही हैं। तीन-तीन साल में भी सुनवाई पूरी नहीं हो रही। नतीजा, जो सूचना 30 दिन के भीतर मिल जानी चाहिए, उसके लिए महीनाें नहीं बल्कि सालाें इंतजार करना पड़ रहा है। लंबी जद्दोजहद और मशक्कत के बाद 12 अक्टूबर 2005 को देश में सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ था।

यह कानून स्वीडन में 1766 में लागू हो चुका था, वहीं भारत से पहले विश्व के 82 देशों में इस कानून का उपयोग किया जा रहा था। कानून लागू हुआ तो इसके जरिये दबी-छिपी सूचनाएं लोगों के पास पहुंचने लगी और इसकी खूब तारीफ हुई। लेकिन समय बीतने के साथ इस कानून को मजबूत करने की बजाए बोथरा करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

अजमेर जिला मुख्यालय की बात करें तो ज्यादातर सरकारी दफ्तरों से सूचना के अधिकार और लाेक सूचना अधिकारियाें से जुड़ी जानकारी देने वाले बोर्ड गायब हो चुके हैं। जबकि सूचना का अधिकार कानून लागू होने के बाद सरकारी दफ्तर में कानून से जुड़ी जानकारी देने केे बोर्ड अनिवार्य रूप से लगवाए गए थे।


कुछ सूचनाएं स्वप्रेरणा से देनी होती हैं

इस कानून में हर सूचना मांगी ही जाए ऐसा नहीं है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 4(1)(बी) के तहत सरकारी विभागों को कुछ सूचनाएं स्वप्रेरणा से आमजन तक पहुंचानी होती है। जिसमें सूचना का अधिकार कानून की जानकारी देने वाले बोर्ड भी शामिल हैं।

प्रचार-प्रसार पर भी खर्चा नहीं
जिला प्रशासन ने सूचना का अधिकार अधिनियम की जानकारी आमजन तक पहुंचाने के लिए किसी तरह का प्रचार प्रसार भी नहीं किया है। यह जानकारी भी आरटीआई के माध्यम से जिला प्रशासन से प्राप्त हुई थी। भास्कर ने इस खबर काे प्रमुखता से प्रकाशित किया था।

ब्यावर के चांग गेट से जगी थी आरटीआई को लागू करने की अलख

पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए बने क्रांतिकारी कानून काे लागू करने की अलख ब्यावर के चांग गेट से शुरू हुई थी। 6 अप्रेल 1996 काे चांग गेट पर मजदूर किसान शक्ति संगठन ने 40 दिनाें तक सरकारी सूचनाओं और कागजाें में पारदर्शिता की मांग काे लेकर धरना दिया था।

देश की प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राॅय के नेतृत्व में दिए गए धरने में बड़ी संख्या में लाेग शामिल हुए। यह ऐसा समय था जब काेई यह साेच भी नहीं सकता था कि सरकारी दफ्तर की किसी फाइल में से कागज की नकल उसे लेने का अधिकार है।

लंबे जन आंदाेलन के बाद कानून लागू हुआ ताे देश के प्रथम सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने 13 अक्टूबर 2015 काे चांग गेट पर सूचना का अधिकार जन्मस्थली का शिलान्यास किया। शिलालेख का लाेकार्पण राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुरेंद्र नाथ भार्गव ने 26 मई 2016 काे किया। यह एक स्मारक के रूप में जनउपयाेगी कानून के लिए बने संघर्ष की कहानी सुना रहा है।

इन दफ्तराें में नजर नहीं आ रहे बाेर्ड
संभागीय आयुक्त कार्यालय, जिला कलेक्टर कार्यालय, पुलिस अधीक्षक कार्यालय, उपखंड कार्यालय, जिला रसद विभाग, तहसील, जिला कोषालय, नगर निगम, बोर्ड ऑफिस, चिकित्सा विभाग, शिक्षा विभाग, जीपीएफ, बिजली, जलदाय, रोडवेज सहित अन्य कई सरकारी विभागों में सूचना के अधिकार के बोर्ड लगाए गए थे। जिन पर सूचना के अधिकार से संबंधित जानकारी अंकित थी, लेकिन अब इनमें से ज्यादातर विभागों के कार्यालयों की दीवारों से बोर्ड हट चुके हैं।


नहीं देते समय पर सूचनाएं
एक अनुमान के अनुसार जिले में हर माह करीब एक हजार आरटीआई आवेदन पेश किए जाते हैं। सरकारी विभाग आरटीआई की सूचना निर्धारित समय पर नहीं देते हैं या फिर गोलमोल जवाब देकर टालने की कोशिश की जाती है। कुछ जुझारू एक्टिविस्ट राज्य आयाेग तक कानून के दायरे में संघर्ष कर रहे हैं।


अधिकार का गला घोंटने की साजिश तो नहीं!

  • आरटीआई कानून लागू होने के बाद सरकारी विभागों के कामकाज में कुछ पारदर्शिता आई है। लोग विभागों से सूचना के अधिकार कानून से तरह तरह की सूचनाएं मांगने लगे हैं। इससे विभागों के कई बड़े घोटाले भी उजागर हुए हैं। जनता के इस अधिकार का गला घोंटने की मंशा से कई सरकारी विभागों से सूचना के अधिकार की जानकारी देने वाले बोर्ड हटा दिए गए हैं, जिससे कि लोगों को कानून की कम जानकारी मिल सके और वह विभागों से सूचनाएं नहीं मांग सके। - तरुण अग्रवाल, आरटीआई एक्टिविस्ट

1975 में सूचना का अधिकार के लिए शुरू हो गई थी मशक्कत

सूचना के अधिकार के लिए सजगता 1975 में आई थी, जब सुप्रीम कोर्ट में ‘उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राजनारायण’ के मामले की सुनवाई हुई। इस प्रकरण में कोर्ट ने अपने आदेश में सरकारी अधिकारियों को सार्वजनिक कार्यों का ब्यौरा जनता को उपलब्ध कराने आदेश दिया।

12 अक्टूबर 2005 को देश में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू होने से पहले कई राज्यों ने अपने स्तर पर इस कानून को लागू कर दिया था। जिसमें राजस्थान भी एक है। राजस्थान में यह अधिनियम पहली बार 2000 में लागू हुआ।

राजस्थान में सूचना के अधिकार को प्राप्त करने के आंदोलन की प्रणेता अरुणा रॉय हैं, उन्हाेंने मजदूर किसान शक्ति संघ के बैनर तले इस कानून के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया था। केंद्रीय कानून बनने के बाद प्रदेश में राज्य सूचना आयोग का गठन 13 अप्रैल 2006 को किया गया। राज्य सूचना आयोग का कार्यालय जयपुर में है। राज्य के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त एमडी कोरानी को नियुक्त किया गया था जिनका अजमेर से गहरा नाता रहा है।



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सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 15 साल पहले लागू किए गए सूचना का अधिकार कानून काे सरकारी नुमाइंदे कमजाेर करने में लगे हैं