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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

1200 ईसवीं पूर्व 52 खम्भों पर बने बीसलदेव मंदिर को संरक्षण का इंतजार

राजमहल. प्रदेश के बड़े बांधों में शामिल बीसलपुर के गेट संख्या एक के करीब बना प्राचीन बीसलदेव मंदिर रामायण काल से जुड़ा है। किवदंती है कि यहां रावण ने भगवान शिव को रिझाने के लिए तपस्या की थी। शिव पूराण में भी इसका उल्लेख है। बाद में वहां बीसलदेव का मंदिर बना दिया गया, लेकिन इस मंदिर पर ना तो प्रशासन का ध्यान है और ना ही पुरातत्व विभाग कार्य कर रहा है। ऐसे में मंदिर की कलाकृतियां धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है।

यह मंदिर सालों तक पुरातत्व विभाग के अधीन होने के कारण अन्य विभाग नजर अंदाज कर रहे हैं। पुरातत्व विभाग की ओर से भी मंदिर परिसर में सार सम्भाल नहीं होने के कारण मंदिर दुर्दशा का शिकार होता जा रहा है। पौराणिक कथाओं व लोगों के अनुसार सदियों पूर्व बनास व डाई नदियों के संगम पर दोनों तरफ अरावली पर्वत मालाओं की शृंखलाओं की पहाडिय़ों की गुफाओं पर कभी रावण की ओर से तपस्या किया जाना बताया जाता है।

दोनों नदियों के संगम पर एक तरफ गुफा मेंं गोकर्णेश्वर शिव मंदिर है तो दूसरी ओर डाई नदी के किनारे पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करने वाला बीसलदेव नामक शिव मंदिर बना है। बीसलदेव शिव मंदिर के शिलालेख व गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी जीवन शंकर शर्मा के अनुसार बीसलदेव मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 1200 ईसवीं में बीसलपुर के तत्कालिन राजा बीसलदेव ने करवाया था, जो आज बीसलपुर बांध के जलभराव किनारे स्थित है।

मंदिर के खंम्भों पर वर्षों पूर्व की बनावट व पत्थरों पर की गई आकर्षक कारीगरी के चलते मंदिर को पुरातत्व विभाग ने अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया था, जो आज भी पुरातत्व विभाग के पास है। बीसलपुर बांध परियोजना के अभियंताओं के अनुसार बीसलदेव मंदिर बांध के निर्माण से पहले ही पुरातत्व विभाग के अधीन था, जिससे बांध निर्माण के दौरान व बांध बनने के बाद भी परियोजना के साथ ही अन्य विभागों ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया ना ही बीसलदेव मंदिर पर कोई निर्माण या फिर पर्यटकों की सुविधाओं के लिए कोई विकास कार्य नहीं कराए गए।

दुर्दशा का शिकार होती धरोहर पर विकास कार्य को लेकर पुरातत्व विभाग की ओर से भी नजर अंदाज किया जाता रहा है, जिससे पौराणिक धरोहर विकास को लेकर आज भी धणी-धोरी को तरस रही है। पुरातत्व विभाग के अधीन होने के कारण मंदिर में सालों से पूजा अर्चना भी नहीं होती है।

यह है मंदिर की खासियत
बीसलदेव मंदिर में पत्थरों को आपस में जोडऩे के लिए तत्कालीन शिल्पियों द्वारा यहां किसी भी प्रकार का चूना, सीमेंट या फिर मिट्टी आदि का कोई प्रयोग नहीं किया गया। मंदिर के गुम्बद पर कुछ सालों पहले पुरातत्व विभाग की ओर से ही सीमेंट लगाई गई है, जिससे गुम्बद टूटे नहीं। बिना चूने व सीमेंट के बने मंदिर की बनावट इसे देखते ही लोगों को आश्चर्यचकित कर देती है।

मुख्य मंदिर के सामने बढ़ी-बढ़ी शिलाओं से बने 52 खम्भों पर आगे का सम्पूर्ण हिस्सा आज भी त्यों का त्यों खड़ा है। नियम बने अड़चन किसी भी प्रकार की पौराणिक धरोहर जो पुरातत्व विभाग के अधीन चले जाने के बाद उस जगह पर अन्य कोई विभाग क्षतिग्रस्त जगह पर मरम्मत तक नहीं करवा सकता। उस जगह की देखरेख सारसम्भाल पुरातत्व विभाग ही करवाता है।

पुरातत्व विभाग के अधीन वाले क्षेत्र या जगह से लगभग 100 मीटर की दूरी के दायरे में किसी भी प्रकार का निर्माण व अन्य कार्रवाई आदि करने पर दण्डनीय अपराध की श्रेणी में माना जाता है। जिससे बांध के तट पर बना बीसदेव मंदिर जहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बांध परियोजना भी किसी प्रकार का कार्य नहीं कर सकती ना ही जिले के आला अधिकारी कोई कार्रवाई कर सकते है।

कुल भराव में भरता जल
बीसलदेव मंदिर के करीब होने से बांध का कुल जलभराव 315.50 आर एल मीटर होने पर बीसलदेव मंदिर भी जलमग्न हो जाता है। जिससे ये जगह कुल जलभराव के बाद पर्यटक भी नहीं निहार पाते है। मंदिर के चारों तरफ रोशनी का अभाव है। वहीं साफ सफाई को लेकर कोई इंतजाम नहीं है। जिससे यहां पर लोग कचरा डाल जाते है वही पर्यटक उक्त मंदिर पर घर से बने भोजन व चाय नाश्ता करने के उपयोग में लेते है जिससे मंदिर की गुणवत्ता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। आर एम 2603सीए-राजमहल। पुरातत्व विभाग की अनदेखी से विकास को लेकर धणी-धोरी को तरसता बीसलदेव मंदिर।



source https://www.patrika.com/tonk-news/bisaldev-temple-awaits-protection-6774194/